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अर्नब और "अयोग्य सत्ताधारियों" के मध्य संघर्ष

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हर-हर महादेव 🙏🙏🙏 ये कोई दो चार दिन पहले शुरू नहीं हुआ और ऐसी घटनाओं की कहानियां दो चार दिन पुरानी हो भी नहीं सकतीं। इस घटना की पटकथा तो उसी दिन लिखी जा चुकी थी जब शिवसेना की गद्दी पर "योग्यता" को ठोकर मारकर एक "अयोग्य व्यक्ति" को उस गद्दी पर थोप दिया गया था।पहली ग़लती तो यहीं हो गई थी और दूसरी ग़लती हुई उस राजनीतिक दल के प्रति अटूट निष्ठा रखने वाले लोगों से, उनकी निष्ठा सचमुच अटूट ही थी। अयोग्यता भी उस राजनीतिक दल के प्रति उनकी निष्ठा को नहीं तोड़ सकी। और वो निष्ठा टूटती भी कैसे?? लोगों ने निवेश किया था भाई.... अपने समय का निवेश.... अपनी भावनाओं का निवेश.... भरोसा किया था किसी राजनीतिक दल पर.... इतने सालों का अपनी भावनाओं का निवेश अपनी निष्ठा का निवेश। लोगों को लगा था कि वह राजनीतिक दल उनकी भावनाओं को प्रतिबिंबित करता है, और लगे भी क्यों न??  उस राजनीतिक दल के मंचों से बातें भी उसी तरह की ही की जाती थीं।  मुश्किल होता है कि यूं ही सालों से चली आ रही किसी के प्रति अपनी निष्ठा को 1 दिन के अंदर ही समाप्त कर देना लेकिन ना उस राजनीतिक दल के

लव जिहाद में पिसती भारत की "बेटियां"

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सभी भग्नि बंधुओं को हर हर महादेव 🙏🙏🙏 ये मोदी - योगी क्या कर रहे हैं?? आर एस एस, बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद् वाले कहां हैं और क्या कर रहे हैं?? उस राज्य में तो भाजपा सरकार है फिर क्या हो रहा है?? इस तरह की बातें अभी आप सबको बहुत सुनने को मिल रही होंगी लेकिन मैं इनमें से एक भी बात आपसे नहीं कहना चाहता। बल्कि मैं तो आपसे यह पूछना चाहता हूं कि आप क्या कर रहे हैं?? अब आप कहेंगे कि हम क्या कर सकते हैं?? हम तो उस राज्य में भी नहीं रहते और न ही उस क्षेत्र में, जहां यह घटना हुई है। तो मेरा प्रश्न आपसे यह है कि अगर आपके यहां, आपके क्षेत्र में भी यह घटना हुई होती तो आप क्या कर लेते या क्या कर सकते थे?? है कोई उत्तर आप सबके पास?? आपके क्षेत्र तो छोड़िए, आपके मोहल्ले या घर में ही हो जाता तो आप क्या कर लेते?? मुझे तो नहीं लगता कि आपके पास कोई उत्तर होगा।  फिर मोदी - योगी, आर एस एस वाले क्या कर रहे हैं?? क्यों चुना है हमने इन्हें?? तो वो क्या करेंगे ये मैं आपको बता देता हूं - मोदी और योगी या इनके अपने राजनैतिक दल के मुख्यमंत्री या जनप्रतिनिधि सब के सब "संवैधानिक पदों" पर

लेख - भारत में धर्मनिरपेक्षता और "पानी - मेंढक सिध्दांत"

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सभी भग्नि बंधुओं को हर हर महादेव 🙏🙏🙏 पिछले दिनों अमीश त्रिपाठी लिखित शिवत्रयी (shiva Trilogy) पढ़ रहा था और उसके दूसरे भाग "नागाओं का रहस्य" (the secret of nagas) में कुछ पात्र "मेंढक और पानी सिध्दांत" पर चर्चा कर रहे होते हैं कि यह सिध्दांत कहता है कि "अगर एक मेंढक को ठंडे पानी के पात्र में डाला जाए तो वह बैठा रहेगा लेकिन अगर उसी मेंढ़क को गर्म पानी के पात्र में डाला जाए तो मेंढक तत्क्षण उछलकर पात्र से बाहर कूद जाएगा।" "लेकिन अगर उसी मेंढ़क को ठंडे पानी से भरे पात्र में डालकर पात्र को गर्म किया जाए तो पानी धीरे-धीरे गर्म होगा और मेंढक उछलकर पात्र के बाहर नहीं कूदेगा वरन् पानी के बढ़ते तापमान के अनुकूल अपने शरीर का तापमान ढ़ालता जाएगा और अंततः पानी बहुत अधिक गर्म हो जाने पर मेंढक मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा।"  भारत की "धर्मनिरपेक्षता" भी कुछ इसी तरह की है। और ऊपर दिए गए सिध्दांत से जोड़कर अगर भारत में "राजनेताओं द्वारा रचित तथाकथित धर्मनिरपेक्षता" को समझा जाए तो यह बताना मुश्किल नहीं होगा कि "यहां मेंढक कौन

विपक्षी राजनेताओं की "अति आक्रामकता"

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सभी भग्नि बंधुओं को हर हर महादेव 🙏🙏🙏 अभी राज्यसभा में फसल के क्रय विक्रय के नियमों से संबंधित बिल प्रस्तुत किए गए और उस पर विपक्ष द्वारा जो हंगामा किया गया और जो "अति आक्रामकता" दिखाई गई, उपसभापति का माइक तोड़ने का प्रयास किया गया, उसे देखकर मुझे "विवेक अग्निहोत्री" द्वारा निर्देशित, "अर्बन नक्सलियों" पर आधारित एक फिल्म "बुध्दा इन ए ट्रॉफिक जाम" के दृश्य का स्मरण हो आया। फिल्म की कथा कुछ ऐसी है कि "जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय" अर्थात् "जेएनयू" की तरह एक "आज़ादी - आज़ादी" का जाप करने वाले विद्यार्थियों और उनको इस "आज़ादी - आज़ादी" के जाप का दिशानिर्देश देने वाले विद्वानों (प्रोफेसरों) से परिपूर्ण एक विश्वविद्यालय होता है। इसमें एक "कॉमरेड प्रोफेसर" जिसका किरदार "अनुपम खेर" ने निभाया है वह एक दृश्य में फिल्म के छोटे शहर से आने वाले एक सीधे साधे "युवा नायक" से कहता है कि प्रोफेसर की पत्नी जो "गैर लाभकारी संस्था" (एनजीओ) आदिवासियों के उत्थान के लिए चल

"अयोग्यता" को सर पर ढ़ोता "प्राचीनतम राजनीतिक दल"

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सभी भग्नि बंधुओं को हर हर महादेव 🙏🙏🙏 आज बात करते हैं एक राजनीतिक दल में "अध्यक्ष पद" को लेकर चल रही उठापटक की... उठापटक भी उन लोगों की जिन लोगों ने राजकुमार को राजकुमार मानने से मना कर दिया और "फुल टाइम लीडरशिप" एवं "फील्ड में सक्रिय नेता" की मांग के साथ एक तरह से राजकुमार को अध्यक्ष पद के सिंहासन पर बैठाने को लेकर अपनी अदृश्य सी पर बड़ी ही पारदर्शी असहमति प्रदान की। अब भला राजमाता तो राजमाता ठहरीं और राजकुमार को राजकुमार मानने से कोई मना सका है क्या आज तक??? तो फिर वर्तमान में राज्यसभा में विपक्ष के नेता एवं पार्टी के अन्य और प्राचीन निष्ठावान नेताओं की प्सेरमुख पदों से  छुट्टी हो गई है और साथ ही कथित रूप से "राजकुमार" द्वारा उन्हेें और "चिट्ठी-पत्री बम" फोड़ने वाले अन्य नेताओं को "बीजेपी का एजेंट"  शीर्षक से सम्मानित किया गया। उसके पश्चात् राजमाता की हर बात पर हां में सर हिलाने वाले लोकप्रिय और राजमाता की "जी हुज़ूरी" की फील्ड में फुल टाइम सक्रिय रहने वालों को मैदान में सजा दिया गया है। अब जिस तरह का

अर्बन नक्सली : बहरूपिया कहो या छद्मवेशी - २

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अर्बन नक्सली : बहरूपिया कहो या छद्मवेशी - २  सभी भग्नि बंधुओं को हर हर महादेव 🙏🙏🙏 इस लेख श्रृंखला के पिछले भाग में हमने वामपंथियों की "बहरूपिया रणनीति" को समझा आज समझेंगे कि इस बहरूपिया रणनीति में फंस जाने के कारण हमने क्या क्या नुकसान उठाए हैं। जो भी बातें मैं अर्बन नक्सलियों के बारे में बताऊंगा उनमें एक बात समान होगी कि ** लोगों को कहीं पर भी यह पता नहीं चलेगा कि वो किसके लिए काम कर रहे हैं और किसका प्रोपेगैंडा फैला रहे हैं, लोगों को यही लगता रहेगा कि वो "सत्य की लड़ाई लड़ रहे हैं"। सबसे बड़ी समस्या यह रही और आज भी है कि इन "अर्बन नक्सलियों" के अलग-अलग रूपों में हमारे सामने आने के कारण हम यह नहीं पहचान सके और आज भी नहीं पहचान पाते हैं कि इनकी असल मंशा क्या है? और इसका सबसे बड़ा जो दुष्परिणाम हुआ है वह है -  **इनका हर एक प्रोपैगैंडा "जन अभियान" बन जाता है -  इनके प्रोपैगैंडा में इनका समर्थन करते हुए भी हम यह नहीं समझ पाते हैं कि हम इनके लिए काम कर रहे हैं और यही इनकी सबसे बड़ी ताकत है और यह सब हमारी जागरूकता की कमी के कारण होता ह

मज़हबी उन्मादियों का पत्थर प्रेम : जिहादियों द्वारा पथराव का कारण

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मज़हबी उन्मादियों का पत्थर प्रेम : जिहादियों द्वारा पथराव का कारण सभी भग्नि बंधुओं को हर हर महादेव 🙏🙏🙏 ये लेख तो मैंने तब लिखा था जब इंदौर में "मज़हबी उन्मादियों" द्वारा डॉक्टरों पर सिर्फ इसलिए पथराव कर दिया गया था क्योंकि वे एक मोहल्ले में लोगों के सैंपल लेने पहुंच गए थे और हमारे एक मित्र यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर ये क्यों हुआ??? क्योंकि वो डॉक्टर्स तो उनका उपचार करने के लिए गए थे फिर भी उनको क्यों पत्थर खाने पड़े??  बात थोड़ी अजीब भी थी तो उनको समझाने के लिए एक पूरा लेख लिख डाला था मैंने। और यहीं से मेरे लिखने की शुरुआत हुई। अब इस बात को समझते हैं  कि "मज़हबी उन्मादी" जहां बहुसंख्यक हैं वहीं क्यों पथराव होता है??  इस्लामिक क़ानून के मुताबिक  कुफ्र की सज़ा होती है  पत्थरों से मार मारकर मुजरिम को मौत की सज़ा देना। *अब सवाल यह है कि कुफर (कुफ्र) क्या होता है? तो इससे पहले हमें उम्मा को समझना होगा। **इस्लाम में या इस्लामिक कानून में राष्ट्र का, देश का कांसेप्ट नहीं होता उनमें उम्मा मानते हैं इसका मतलब सारे विश्व में कहीं भी या दूसरे ग्रह पर ही क्यों